सत्तर पार के संकल्प

 

*लक्ष्मी नारायण

सारा विश्व आज स्वयं को बधाई दे सकता है क्योंकि सबकी शान्ति और समृद्धि के संकल्प के साथ जन्मा, संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी 70 वीं वर्षगांठ मनाकर, 71 वें वर्ष में प्रवेश कर गया है। यह एक बहुत नायाब मौका कहा जा सकता क्योंकि इससे पहले, इतने व्यापक स्तर पर स्वीकार्य और इतने लम्बे समय तक सक्रिय रहने वाले,

किसी अन्य संगठन का उदाहरण,शायद ही दुनिया के सामने हो । सत्तर पार के संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस बार,” 2015 वर्षोपरान्त विकास कार्यक्रम ” के नाम से नया संकल्प लिया है। इस संकल्प को सारी दुनिया के सब लोगों व सारी पृथ्वी की समृद्धि, सबकी सहभागिता और सर्वत्र शांति की कार्ययोजना बताया गया है। नए संकल्प में, प्राथमिक तौर पर ही, जोर दिया गया है किइस वैश्विक सहयात्रा में कोई पीछे न छूटे । यह बड़ा महत्वाकांक्षी और स्वागत योग्य इरादा है जिसे दुनिया के राष्ट्र / सरकार प्रमुखों ने एक स्वर से सहमति दी है और जिसे दुनिया के हर व्यक्ति का समर्थन मिलाना चाहिए।

विश्व नेताओं ने माना है कि वर्तमान समय सतत विकास के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण है। देशों के बीच गैर -बराबरी बढ़ रही है। अवसरों, सम्पत्ति और शक्ति के समीकरण बहुत विषम हैं। बेरोजगारी,विशेषतः युवाओं में बेरोजगारी,बढ़ रही है। जटिल किस्म के संघर्ष, हिंसा और अतिवाद,मानवीय संकट व बढ़ते प्रवास,घटते प्राकृतिक संसाधन,दूषित होते पर्यावरण के विपरीत प्रभाव, सूखा,वापस न लौटने वाले जलवायु परिवर्तन प्रभाव,आदि ऐसी चुनौतियां मानी गयीं है जिनके कारण बहुत से समुदायों और स्वयं धरती का अस्तित्व संकट में पड़ गया है।इसलिए विश्व नेताओं ने निर्धनता, भूख, बीमारी और अभावों से मुक्त विश्व का महात्वाकांक्षी संकल्प लिया है । नए संकल्प में 17 लक्ष्य और 169 उपलब्धि-मानदण्ड तय किये गये हैं। इन्हें सतत विकास लक्ष्य(Sustainable Development Goals) कहा गया है जो अब तक काफी प्रचारित मुहावरा बन गया है। सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की अवधि 15 वर्ष पार कर वर्ष 2030 रखी गयी है। यह वही परंपरा है जो 21 वीं सदी शुरू होने से पहले वर्ष 2015 तक ” सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य ” पाने की उम्मीद में रखी गयी थी।

सतत विकास के लिए पहला लक्ष्य हर जगह से हर किस्म की निर्धनता को ख़त्म करने का रखा गया है लेकिन इसके लिए उपलब्धि मानदण्ड तय करते समय अति निर्धनता को वर्ष 2030 तक समाप्त करने और निर्धनता को आधा ख़त्म करने की बात की गयी है। पढने -सुनने में यह आकर्षक लग सकता है लेकिन यह मानदण्ड मुंह दिखाने लायक बहाने जैसा भी हो सकता ,जैसा कि पिछले 20 -25 वर्षो में तय किये गए लक्ष्यों में होता रहा है। अति निर्धनता पर ध्यान देने के नाम पर पिछले साल भर में भारत में ही गरीबी रेखा कार्ड धारियों से इतर अन्य निर्धनो को कम दरों पर अनाज उपलब्ध कराना बंद कर दिया गया है जिससे उनके भी अति निर्धनता के दायरे में आने की आशंका बढ़ गयी है जिन्हें उस स्तर से ऊपर माना गया था। स्पष्ट है कि अति निर्धनता और निर्धनता में भेद करते समय निर्धनता बढ़ाने वाले कारणों का ध्यान रखना ज़रूरी है। इसके अलावा निर्धनता और अति निर्धनता की सीमा में आने वाले लोगों या परिवारों की पहचान में हुई व्यापक धांधलियां दूर करने की भी किसी नेता या नौकरशाह की हिम्मत नहीं है। ऐसे मसलो पर ध्यान दिए बिना गरीबी दूर करने का लक्ष्य नींद में आए ख्वाब जैसा ही रह जायेगा ।

लक्ष्य दो में भूख को ख़त्म करने के साथ खाद्य सुरक्षा ,परिष्कृत पोषण और सतत कृषि को प्रोत्साहन देने की बात कही गयी है। उपलब्धि मानदंड बताते हैं कि कृषि उत्पादन दुगुना किया जायेगा और जमीन तक समान पहुँच बनायीं जाएगी। यह विश्वसनीय नहीं है पर विचारणीय ज़रूर है कि जिस तरह आर्थिक सुधारों पर जोर दिया जा रहा है और किसानों व आदिवासियों से, गैर सरकारी और सरकारी तौर पर जमीनें हड़पी जारही हैं उससे किसको यह उम्मीद जग सकती है की जमीनों को सबकी पहुँच में रखने और कृषि उत्पादन दुगुना करने के लक्ष्य में कोई ईमानदारी बाकी है। जब निर्धारित लक्ष्य संदेह के दायरे में आरहा है तो उसका क्रियान्वयन कैसा होगा ,यह भी समझा जा सकता है। ऐसी सोच और पहुँच के चलते, भूख जो अभी भी दुनिया में सबसे ज्यादा मौतों के लिए जिम्मेदार है ,इसी तरह विनाशकारी

लक्ष्य तीन में स्वस्थ जीवन और हर उम्र के लोगों के कल्याण का सपना देखा या दिखाया गया है लेकिन यह कौन करेगा , कैसे करेगा,इस पर सामान्य पर्यवेक्षक की नज़र जाना ज़रूरी है। भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और साधन विपन्न लोगों के देश में सरकार जिस तरह खुद को नाकारा साबित करने तथा जन -धन से खड़े किये गए स्वास्थ्य ढाँचों को निजी हाथों में सौपने की जल्दी में है, उसे देखते हुए सबको, खासतौर से निर्धन लोगों को स्वास्थ्य व चिकित्सा सुविधा कैसे और कब उपलब्ध होगी । यहाँ यह याद करना ठीक रहेगा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 1977 और भारत सरकार ने वर्ष 1986 में जारी अपनी स्वास्थ्य नीति में “वर्ष 2000 तक सबको स्वास्थ्य” का लक्ष्य निर्धारित किया था । विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार कहाँ तक पहुंचे, और स्वास्थ्य सेवाएं साधन-विपन्न लोगों के कितने नज़दीक पहुँचीं – यह किसी से छिपा नहीं है।

लक्ष्य चार ,सबके लिए समावेशी,समान और श्रेष्ठ शिक्षा के अवसर -जीवन पर्यन्त उपलब्ध कराने की बात करता है। साफतौर पर ही यह नारेबाजी जैैसा लक्ष्य है। जितनी तरह के शिक्षा संस्थान अभी भारत में उपलब्ध हैं और उनकी जैसी उपलब्धियाँ लोगों के सामने हैं वे कतई आशा नहीं जगाती हैं। बिना छत, बिना दीवार , बिना शिक्षक और बिना किताब -कॉपी से लेकर सात सितारा किस्म के विद्यालयों के होते समान शिक्षा तथा लाखों बच्चों के बाल मजदूरी करते सबको शिक्षा की बात बेमानी है। इन हालात में बदलाव के लिए कौन दृढ़संकल्पित है और वह कितना जोखिम

लक्ष्य पॉँच सभी बालिकाओं व महिलाओं के सशक्तीकरण व समानता को लेकर है। भारत में, अभी, शिक्षा से ज्यादा शिक्ष मंत्री चर्चा में हैं। शिक्षा यहां राज्यों का विषय है। बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून बन चुका है लेकिन शैक्षणिक संस्था और समानता संदेह के घेरे में है । बालकाओं व महिलाओं का सशक्तिकरण और समानता की दूर उनकी सुरक्षा भी बिलकुल सुनिश्चित नहीं है। नैतिकता और कानून का राज जैसे है ही नही। फिर कैसे हम टूटे हुए औजारो को लेकर महिला शक्तिकरण और सुरक्षा की इमारत गढ़ेंगे ।

इसी तरह, सबके लिए जल उपलब्धता व स्वच्छता,पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा उपलब्धता जैसे लक्ष्य आकाश के तारे तोड़ने जैसे ही हैं। यह कुल सत्रह लक्ष्यों में से सिर्फ सात की बात है जो बिलकुल मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं से सम्बन्धित हैं। बाकी के दस लक्ष्य व करीब पचास मानदण्ड भी सुनने में सहज और गुणने में असहज लगते हैं। भारत सरकार द्वारा हाल ही, शिवराज सिंह चौहान समिति के सिफारिशें स्वीकार कर,17 केंद्रीय योजनाओं में से अपने 75 प्रतिशत योगदान को घटाकर 60 प्रतिशत कर देने से मिडडे मील, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, सर्व शिक्षा अभियान,ग्रामीण पेयजल,स्वच्छ भारत, एकीकृत बल विकास योजना,सबको आवास, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना,पशुधन विकास योजना,राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान,जैसी योजनाओ. पर राज्यों को, अब 25 प्रतिशत के बजाय 40 प्रतिशत खर्च करना पड़ेगा जो सतत विकास लक्ष्यों को पाने की राह अटकाने जैसा है, क्योंकि कोई राज्य इस भार उठाने के लिए आसानी से तैयार नही होगा और टालमटोल करता रहेगा ।

सतत विकास के अन्य लक्ष्यों, में सदस्य देशों के अंदर और उनके बीच असमानता घटाने, उत्पादन व उपभोग के तरीकों को सातत्योन्मुखी बनाने, जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए तत्काल कदम उठाने के मुद्दे वाकई ज्वलन्त हैं जिन पर ध्यान दिया जाना बहुत ज़रूरी है। सोलहवाँ और सत्रहवाँ लक्ष्य, इस सारे दस्तावेज की जान कहे जा सकते हैं। सोलहवें लक्ष्य में सतत विकास के लिए शांतिपूर्ण और समावेशी संस्थाओं को बढ़ावा देने, सबके लिए न्याय सुनिश्चित करने और हर स्तर पर समावेशी, प्रभावी और विश्वसनीय संस्थाएं खड़ी करना तय किया गया है। इसमें सब प्रकार की हिंसा व सम्बन्धित मौतों को कम करने,बच्चों के प्रताड़न, शोषण,व्यापार व हिंसा को ख़त्म करने,संगठित  अपराधों व हथियारों, रिश्वत व भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने की बात की गयी है जो बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकल्प हर स्तर पर प्रभावी, पारदर्शी और प्रामाणिक संस्थाएं विकसित करने,हर स्तर पर प्रातिनिधिक , सहभागिता वाली, समावेशी और उत्तरदायी निर्णय प्रक्रिया सुनिश्चित करने की है। यदि किसी तरह ऐसा करना सम्भव हो तो सतत विकास का हर लक्ष्य पाना आसान हो जायेगा।

सत्रहवाँ लक्ष्य जो क्रियान्वयन के साधनों को मज़बूत करने की बात करता है, भी सोलहवें लक्ष्य का पूरक हो सकता है। यह लक्ष्य, सतत विकास लक्ष्यों की पूर्ति के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने, तकनीक उपलब्ध कराने, क्षमता संवर्धन करने, आदि पर भी ध्यान दिलाता है जो किसी भी कार्यक्रम के क्रियान्वयन के हाथ -पैर हो सकते हैं। यहीं क्रियान्वयन प्रक्रियाओ के प्रबोधन तंत्र की रुपरेखा पर विचार किया गया है।

सतत विकास लक्ष्यों पर बात करते समय, संयुक्त राष्ट्र महासचिव श्री बान की मून का यह आकलन निश्चय ही

गंभीर विचार मंथन का परिणाम दिखाई देता है कि —-हम पहली पीढ़ी हैं जो निर्धनता को समाप्त कर सकते हैं और आखिरी पीढ़ी हो सकते हैं जो ऐसा कर सकते हैं। अगर हम, जिनमें सभी सदस्य देशों के सभी राष्ट्र प्रमुख, उनकी सरकारें, आर्थिक -सामाजिक व नागरिक संगठन और वे नागरिक जो अत्यन्त साधन विपन्न समुदाय में नहीं हैं, सतत विकास लक्ष्यों को लेकर मन, वचन और कर्म से ,ऐसा करना चाहें तो निश्चय ही ऐसा कर सकते हैं।

सतत विकास लक्ष्यों को अमली जामा पहनाए के लिए जो ज़रूरी कदम हो सकते हैं, उनमे कुछ ये भी हैं :

* विश्व स्तर पर जो कार्यक्रम बनाया गया है उसे सीधे स्थानीय स्तरों पर से शुरू किया जाये। जैसे निर्धनता को समाप्त

करने की बात है तो बिलकुल स्थानीय स्तर पर,स्थानीय सहयोग से निर्धन लोगो व परिवारों की पहचान की जाये व उन्हें

* पहचान प्रक्रिया व परिणामों की तत्काल सघन जाँच हो और कोई गलती पाये जाने पर, उसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति

(राज्य्कर्मी / जनप्रतिनिधि / स्वैच्छिक कार्यकर्त्ता ) को तत्काल, बिना लम्बी न्यायिक प्रक्रिया के

*भोजन, पोषण,स्वास्थ्य-चिकित्सा ,शिक्षा , आवास और रोजगार आवश्यकताओं की भी इसी तरह पहचान व पूर्ति की

यदि प्रारंभिक सात लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए, ऐसे ईमानदार प्रयास किये जायें तो शेष दस लक्ष्यों की प्राप्ति भी

आसान हो जाएगी। और इतना तो साफ है कि निर्धनता और अति निर्धनता जैसे अमानवीय अभिशापों से ज़रूर मुक्ति पायी जा सकती है जैसा कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव देख रहे हैं।