बच्चों के अधिकार

 

वे हर दिन क्रूर और अमानवीय उपचार के अधीन है , उन्हें स्कुल जाने का अवसर नही मिल रहा है ,वे सड़कों पर ,घरों में हिंसा के कहि रूपों से पीडित है। वे बच्चे है।

एक पक्तिं  याद आ रही है-
बच्चे मन के सच्चे सारी जग की आँख के तारे , ये वो नन्हें फूल है जो भगवान को लगते प्यारे।
मानव अधिकारों के इतिहास  में बच्चों के अधिकारों की बात की गयी है।  20 नवंबर, 1989 को संयुक्त राष्ट्र महासभा बाल अधिकार (सीआरसी) पर सम्मेलन को अपनाया। 26 जनवरी 1990 को सत्र के पहले दिन, 61 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किये। भारत ने 1992 में सीआरसी की पुष्टि की बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन ( UNCRC ) में न्यूनतम हको और स्वतंत्रता की परवाह किये बिना हर जाति के 18 वर्ष से कम उम्र के हर नागरिक ( जो बच्चा ) है के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए की कि राष्टीय मूल , रंग ,लिंग , भाषा ,धर्म  के रूप में  बाल अधिकार को परिभाषित करता है। (UNCRC – ने बच्चे के सभी अधिकारों को शामिल किया  है, जिसमे नागरिक , राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक , और सांस्क़तिक अधिकार शामिल है। मौलिक मानवधिकारों की रुपरेखा  चार व्यापक वर्गीकरण में बच्चों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए  1.सही जीवन रक्षा के लिए – अधिकार पैदा होने का ,भोजन आश्रय और कपड़ो के न्यूनतम मानकों  का अधिकार ,गरिमा के साथ जीने का अधिकार ,सुरक्षित पीने के पानी के साथ पौष्टिक भोजन व एक स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण ,और स्वास्थ्य पूर्ण देखभाल।
2अधिकार सरक्षण के लिएउसे यह अधिकार है की हर तरह की हिंसा से उसकी रक्षा हो , उपेक्षा से सरक्षित किया जाना चाहिए ,शारीरिक और यौन शोषण से उसकी रक्षा हो , खतरनाक दवाओं से सरक्षित हो सही भागीदारी के लिए –सही राय की स्वतंत्रता के लिए ,  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिएअधिकार एसोसिएशन की स्वतंत्रता के लिए, सुचना का अधिकार ,निर्णय लेने में सहभागिता का अधिकार , 4. विकास के अधिकार – शिक्षा का अधिकार , जानने का अधिकार , आराम करने और खेलने का अधिकार, विकास के सभी रूपों का अधिकार जैसे भावनात्मक , शारीरिक एवं मानिसक इत्यादि।
बाल अधिकार सम्मेलनों का प्रभावअंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून में एक मील का पत्थर बाल अधिकारों पर सम्मेलनबच्चों के वैश्विक मुद्दों पर व् साथ ही साथ राष्ट्रीय एजेंडे से संबंधित सभी मुद्दों पर लगाने पर भूमिका निभायी है। इसके आलावा ये बड़े पैमाने पर अधिकार और दुनिया भर में बच्चों के विकास की प्राप्ति के लिए अच्छा कदम रहा है। यह कोई एक रात में पहल नही थी बल्कि बच्चों के अधिकारों को गोद लेने का प्रभाव था। की बच्चों की और अनुकूल सकारात्मक रचनात्मक नजरियों को आकर देने का प्रभाव था ,पिछले 25 वर्षों में, सम्मेलन और बच्चे पर उसके प्रभाव का कार्यान्वयन अच्छी तरह से किया जा रहा है देश से दूसरे देश में और दुनिया के एक क्षेत्र से दूसरे से अलग किया। विश्लेषण के आधार पर बच्चो से संबंधित मुद्दों के समाधान में एक व्यापक रूप में प्रगति हुई है तथा बच्चो के सर्वोत्तम हितों के सिद्दांतो की रक्षा में वृद्धि हुई है। हालांकि अभी तक विकासशील देशों, विशेषकर भारत में, बच्चों के अधिकारों को साकार करने में जाने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना अभी भी बाकि है। नियम और सम्मेलन के प्रावधानों को लागू करने और बच्चों के लिए उपयुक्त एक दुनिया बनाने के लिए सभी स्तरों पर बच्चों के कल्याण के लिए प्रयास तेज करने की जरूरत है।

बाल अधिकार और दुनिया
सामाजिक न्याय के लिए प्रयास कर दुनिया भर से लोगो  को अक्सर समाज बच्चो में सबसे कमजोर की और उनके प्रयासों का वर्णन किया है गेस एबर्ट की तरह कार्यकर्ताओं के प्रयासों और इतिहास एमएस में सबसे कम उम्र के   नोबेल शान्ति के  पुरस्कार विजेताओं के लिए बच्चो की  राजकुमारी डायना के धर्मार्थ काम से , मलाला यूसुफजई इन मशहूर बच्चों के अधिकार कार्यकर्ताओं सबसे कम उम्र के नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने में मदद करने में सराहनीय प्रयास डाल दिया है । और श्री कैलाश सत्यार्थी अनुसार की सभी बच्चों पर एक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है कि उन्हें अवसर प्रदान करने में आगे बढ़ाने पर अपने विचार रखने के लिए जरूरत की सभी यादे दिला दी है । अवसरों के लिए उन्हें खुद को, अपने समुदायों और दुनिया को जानने और उन्हें बन्धन मुक्त होने के लिए सशक्त बनाना है।  कि मानसिकता और कौशल का लाभ, विकसित करने के लिए अनुमति देने के लिए पर्याप्त सार्थक अवसर प्रदान करना होगा हैं

भारत की जनसंख्या का एक तिहाई से भी ज्यादा 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की आबादी वाला देश है , भारत देश बच्चों के बुनियादी अधिकारों को सुनिशित करने की दिशा में प्रतिबद्ध है। लेकिन फिर भी बाल अधिकारों की नीतियाँ और कानूनो को सर्वत्र ( भूमंडलीकरण ) करने की प्रक्रिया का नतीजा अटका हुआ है , जिनको हम बुनियादी स्वास्थ्य पोषण और आश्रय की बिगड़ते स्तरों से देख सकते है बच्चें परिवार और समुदायों पर निर्भर है और उन्हें सामाजिक लाभो से वंचित किया जा रहा है ,जिससे सड़कों पर सविदा बच्चों की संख्या बढ़ रही है उनकी तस्करी की जा रही है उनसे पूर्णकालीन श्रम करवाया जा रहा है

भारत में बच्चों की जमीनी हकीकत
भारत में दूसरे देशों की तुलना में  बाल    श्रमिको की संख्या सबसे ज्यादा है, स्कुल से बाहर ( ड्राप आउट )की संख्या सबसे ज्यादा 100 में  से 66 लडकिया  है, विकासशील देशों में देखे तो भारत में 40 % बच्चे  बाल कुपोषण के शिकार है  , 0-6 आयु वर्ग में लड़कियों की घटती संख्या चिंता का विषय है क्योंकि 1000 लड़कों के मुकाबले केवल 927 लड़कियां हैं, भारत में 65 % लड़कियाँ 18 साल से भी कम उम्र में शादी करके माँ बन जाती है जो सोचनीय विषय है , यौन दुर्व्यवहार से पीड़ित 16 साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या भारत में सर्वाधिक है।

सरकार कार्रवाई  ( Government Action)
भारत सरकार ने नौवीं पंचवर्षीय योजना में हर बच्चे (1997-2002) के लिए अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा की। दसवीं पंचवर्षीय योजना में बच्चों के अस्तित्व, विकास, संरक्षण और भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए एक अभिसरण / एकीकृत अधिकार आधारित दृष्टिकोण की वकालत की। सरकार ने देश में बाल अधिकारों के कार्यान्वयन के लिए बाल अधिकारों पर एक राष्ट्रीय समन्वय समूह का गठन किया है, बाल अधिकारों के संरक्षण के विषय पर एक चेयर की स्थापना की गई है सरकार ने भारत में बाल उत्पीड़न पर एक अध्ययन पूरा कर लिया है और एक मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया में है